
मतदाता कर चुका है फैसला, चुनाव सिर्फ दलालों का बाकी
जनपथ टुडे, डिंडोरी, 9 नवम्बर 2023, प्रदेश भर में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान की घोषित तिथि 17 नवम्बर है। 12 नवम्बर को दीवाली है जिसकी तैयारियों में आमजन व्यस्त है। दीवाली होते ही मतदान का दिन आ जाएगा। पिछले 15 दिनों से प्रत्याशी प्रचार ने लगे हुए है। गांव, शहर और गलियों से लेकर त्यौहारी बाजारों तक में चुनाव प्रचार, सभाओं और रैलियों का शोर सुनाई दे रहा है जो 15 नवम्बर तक चलेगा। जानकारों का ऐसा मानना है कि चुनावी मैदान में जो भी प्रत्याशी है उनके चेहरे और चाल चरित्र को आम मतदाता जान समझ चुका है और लगभग यह भी तय कर चुका है कि उसे किसको अपना वोट देना है और मतदाताओं के इस निर्णय में आंशिक बदलाव भले हो सकता है पर प्राय: मतदाता के मन की पेटी में उसका मत बंद हो चुका है। किन्तु चुनाव की खास सरगर्मी और रात – दिन की मारामारी दीवाली के बाद ही दिखाई देगी। सवाल यह है कि जब मतदाता अपना मन बना चुका है तो फिर चुनाव की सरगर्मी क्यों बढ़ेगी! इसके पीछे की वजह है प्रत्याशी आखिरी समय में कोई कसर बाकी नहीं रखना चाहता है और चुनाव में सक्रिय दलाल जिनकी लंबी चैन है जिसमें छोटे, बड़े और मझौले सब तरह के दलाल शामिल है वे अब तेजी से सक्रिय होगे और प्रत्याशियों तक यह खबर पहुंचाएंगे की अमुक क्षेत्र, अमुक लोग टोला या मौहल्ले के लोग दूसरे पक्ष में जा सकते है, इनको रोकने के लिए पैसा,शराब, मुर्गा, बकरा, कम्बल आदि आदि सामग्री देना बहुत जरूरी है तब चुनाव लड़ रहे लोग अपने अपने स्तर से इन सब चीजों की व्यवस्था करेगे और फिर चमकेगी दलालों की किस्मत, आधा बटेगे और आधा खा जायेगे। अब बस इन्हीं दलालों का चुनाव बाकी है और अब ये दिन रात उलटफेर की संभावनाएं दिखाकर चुनाव लड़ रहे लोगों के घर पर डेरा डाले दिखाई देंगे, आने वाले दिनों में बस इन्हीं दलालों के लिए चुनाव बाकी है शेष तो मतदाता जिस और जाने का मन बना चुके है चुनाव के परिणाम उसी तरफ जायेगे।
खास बात यह है कि चुनाव में दलाल की भूमिका निभाने वाले इन लोगों के अलग अलग स्तर है। मोहल्ले की जवाबदारी उसके बाद गांव, फिर पंचायत फिर क्षेत्र उसके बाद ब्लॉक और फिर प्रत्याशी या उनके करीबी लोगों से संपर्क बनाने वाले दलाल। इस तरह केडर के हिसाब से हर दलाल अपनी अपनी पोजीशन पर सैट रहता है। दलालों की ये पोजीशन चुनाव दर चुनाव काम, अनुभव और संपर्कों के हिसाब से बढ़ती या फिर घटती जाती है।
प्रत्याशी के जागने से पहले और सोने के बाद तक उसके दरवाजे पर अलग अलग क्षेत्र के दलालों का जमवाड़ा दिखाई देता है। प्राय: दलाल चुनाव के शुरुआती दौर से एक ही प्रत्याशी के लिए काम करता है और वह धीरे धीरे उसके अर्थतंत्र का अनुमान लगा लेता है और आखिर में इन सब दलालों का आपसी घालमेल हो जाता है। ये ही चुनाव के किरदार है जो मतदान के एक रात पहले तक चुनाव का रोमांच बनाए रखते है और पारी के अंत में चुनाव को और अधिक रोचकता देते है और तमाम ज्ञानवान लोगों को चुनाव परिणाम का अनुमान तक नहीं लगाने देते की आखिर में क्या होगा। पिछड़े से पिछड़े क्षेत्रों में चुनाव खर्च करोड़ों में पहुंचने में इन्हीं दलालों की मुख्य भूमिका है और अब आगे बस इन्हीं दलालों का चुनाव बाकी है, सारे देश में चुनाव में जिस दारू मुर्गे की बातें बहुत होती है वह तो बस टेरर है चुनाव लडने वालो को रातो रात हलाल तो ये ही दलाल करते है। लाखों लाख रुपयों का खेल आखिर के दिनों में करते है ये दलाल जिनका खेल शुरू होना अभी बाकी है……..