अधिवक्ता सम्यक जैन के पत्र के बाद हरकत में पीडब्ल्यूडी, फर्जी टेंडर दस्तावेज़ों पर ठेकेदार के खिलाफ एफआईआर की तैयारी

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-सवालों के घेरे में अधिकारी, क्या बिना संरक्षण के संभव थी यह जालसाजी?

संपादक प्रकाश मिश्रा 8963976785
जनपथ टुडे डिंडोरी 16 जनवरी 2026 – लोक निर्माण विभाग (PWD) की निविदा प्रक्रिया में सामने आए कूटरचित दस्तावेज़ों के मामले ने प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विभागीय जांच में यह स्पष्ट रूप से स्थापित हो चुका है कि ठेकेदार सुरेंद्र प्रसाद ओझा द्वारा निविदा के दौरान प्रस्तुत Annual Turnover Certificate और Balance Sheet फर्जी व जालसाजी युक्त थे। इसके बावजूद अब तक आपराधिक मामला दर्ज न होना संदेह को और गहरा कर रहा है। प्रकरण में अब कार्यपालन यंत्री, लोक निर्माण विभाग, डिंडोरी ने कोतवाली डिंडोरी थाना प्रभारी को पत्र लिखकर भारतीय दंड संहिता की धारा 420 सहित अन्य संगीन धाराओं में FIR दर्ज करने की मांग की है। पत्र में उल्लेख है कि यह कार्रवाई मुख्य अभियंता, लोक निर्माण विभाग, जबलपुर परिक्षेत्र द्वारा जारी आदेश के अनुपालन में की जा रही है।

सी. ए. ने किया फर्जीवाड़े का पर्दाफाश, कहा फर्जी है दस्तावेज 

जांच के दौरान संबंधित चार्टर्ड अकाउंटेंट/प्राधिकृत व्यक्ति ने लिखित में स्पष्ट किया कि जिन दस्तावेज़ों के आधार पर ठेका लिया गया, वे न तो उनके कार्यालय से जारी हुए और न ही उन पर उनके हस्ताक्षर या सील है। यानी निविदा प्रक्रिया में सीधे-सीधे धोखाधड़ी, कूटरचना और कूटरचित दस्तावेज़ों का प्रयोग किया गया।

विभाग ने माना दस्तावेज़ फर्जी, तो FIR क्यों नहीं?

सबसे अहम तथ्य यह है कि विभाग स्वयं उक्त निष्कर्ष पर पहुँच चुका है। इसी आधार पर संबंधित ठेकेदार के विरुद्ध पंजीयन निलंबन जैसी दंडात्मक कार्रवाई भी की जा चुकी है। ऐसे में यह सवाल लाज़मी है-जब विभाग मान चुका है कि दस्तावेज़ कूटरचित हैं, तो अब तक FIR क्यों दर्ज नहीं हुई? क्या यह सिर्फ ठेकेदार की गलती है या किसी स्तर पर विभागीय संरक्षण भी शामिल है?

अधिवक्ता सम्यक जैन ने मुख्य अभियंता, लोक निर्माण विभाग को पत्र लिखकर आपराधिक प्रकरण दर्ज करने की थी मांग

इस पूरे प्रकरण में अधिवक्ता सम्यक जैन ने दिनांक 07 जनवरी 2026 को ही मुख्य अभियंता, लोक निर्माण विभाग, जबलपुर परिक्षेत्र को पत्र लिखकर आपराधिक प्रकरण दर्ज करने की मांग कर दी थी। अपने पत्र में उन्होंने स्पष्ट लिखा था कि विभागीय आदेशों के माध्यम से यह तथ्य अभिलिखित एवं स्थापित हो चुका है कि निविदा में दिए गए दस्तावेज़ फर्जी हैं, ऐसे में FIR दर्ज न करना कर्तव्य में गंभीर लापरवाही और संभावित आपराधिक संरक्षण की ओर इशारा करता है। अब जब विभाग स्वयं पुलिस से FIR दर्ज करने का अनुरोध कर चुका है, तो बड़ा सवाल यह है कि—
क्या केवल ठेकेदार पर कार्रवाई होगी? या उन अधिकारियों की भी भूमिका जांच के दायरे में आएगी जिन्होंने ऐसे दस्तावेज़ों को सत्यापित कर निविदा स्वीकृत की? यदि इस प्रकरण में समय रहते आपराधिक कार्रवाई नहीं होती, तो यह न केवल सरकारी निविदा प्रणाली की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाएगा, बल्कि ईमानदार ठेकेदारों के साथ भी खुला अन्याय होगा। फिलहाल पूरे मामले पर जिले से लेकर संभाग स्तर तक खामोशी बनी हुई है, जबकि पुलिस की कार्रवाई का इंतज़ार किया जा रहा है।

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