रैलियों की “भीड़” से ” बिहार का भविष्य” न आंके……. !

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जनपथ टुडे, की नज़र से बिहार चुनाव : पंकज शुक्ला

बिहार में चुनाव है और अब तक का सबसे अनूठा और अलग है ये चुनाव, जहां पूरे विश्व में राजनैतिक गतिविधि नहीं हो रही है और चुनाव इस दौर में कहीं भी मुनासिब नहीं समझा जा रहा है तब बिहार में विधानसभा के चुनाव हो रहे है। निर्णय चुनाव आयोग का, प्रजातंत्र की रक्षा के चुनाव बेहद जरूरी है भले “प्रजा” महामारी में बचे ही न पर “तंत्र” की चाबी तो किसी को सौंप जाए। खैर ये चुनावों की अहमियत और आमजन की सुरक्षा की बात है जिससे कम से कम सरकार को कोई वास्ता है नहीं। खैर अब जब बिहार में चुनाव चरम पर है तब हर कोई इसके “पॉजिटिव” और “निगेटिव” टेस्ट में लगा है, परिणाम जो भी आए किन्तु देश में चुनाव के पहले हर आदमी अपने अनुमान का जो आनंद लेता है उसका मज़ा ही कुछ और है। शायद दुनियां के किसी भी मादक पदार्थ से अधिक शुरुर देने वाली म्याद है इसकी, कम से कम 20 दिन। चलिए अब इसी शुरुर पर …………..

 

 

लोगों का काम-धंधा ठप है, नौकरियाँ हैं नहीं और बिहार से बाहर जा कर काम करने वालों की एक बहुत बड़ी तादाद इस चुनाव में पहली बार बिहार में ही है और कोरोना ने महीनों तक उन्हें सामाजिक कार्यक्रमों से दूर रखा है। इस सब के बीच चुनाव किसी मेले जैसा अवसर बन कर आया है तो लोग इसमें खूब हिस्सा ले रहे हैं। बतकही की बैठकें लग रही हैं और चुनाव के सामूहिक जश्न में कोरोना की फ़िक्र को धुएं में उड़ाया जा रहा है।

भीड़ से अंदाज़ा अमूमन तब लगता है जब कोई बड़ी लहर काम कर रही हो। जैसे दिल्ली में केजरीवाल की लहर थी, केंद्र में मोदी की लहर थी या बिहार में ही नीतीश कुमार की पूर्व के चुनावों में लहर थी। इस बार ऐसी कोई लहर किसी की नहीं है। मोदी भले ही आज भी यहां लोगों को पसंद हैं लेकिन उनके नाम पर विधानसभा सभा में वोट देने वाले खोजने पर भी नहीं है।

 

यही हाल नीतीश का है, इस बार राज्य स्तर पर उनकी भी कोई लहर नहीं है. ‘बिहार में बहार है, नीतिशे कुमार है’ जैसे नारे तो ख़ुद जदयू वाले भी इस बार नहीं लगा रहे, जनता तो छोड़ ही दीजिए। हाँ, मुख्यमंत्री के सवाल पर आज भी नीतीश कुमार को पहली पसंद बताने वालों की संख्या अधिक जरूर हैं, लेकिन नीतीश के नाम के साथ ही लोग चार किंतु-परंतु भी लगाने लगे हैं.

लोग ये जरूर मानते हैं कि लालू यादव की तुलना में नीतीश कुमार कहीं ज़्यादा बेहतर मुख्यमंत्री साबित हुए हैं। लोग खुलकर स्वीकारते हैं कि बीते 15 साल में बहुत कुछ बदला है, अब घरों से निकलते हुए डर नहीं लगता, गुंडाराज कम हुआ है और विकास के कार्य भी हुए हैं। लेकिन इसके साथ ही ये जोड़ना भी नहीं भूलते कि भ्रष्टाचार लगातार विकराल हुआ है। बिना घूस दिए छोटा-बड़ा कोई काम नहीं होता और अफ़सर ही अब दबंगों की जगह ले चुके हैं, वे नए ‘वसूली वाले” है।

प्रदेश-व्यापी लहर नहीं है तो हर सीट का अपना अलग गणित ज़्यादा काम कर रहा है। तेजस्वी ने अलग तेज दिखाया है, उनकी चर्चा जमकर हो रही है और यही कारण है कि उनकी रैलियों में भीड़ दिनों दिन बढ़ रही है। लेकिन फिर वही बात, ये भीड़ पैमाना नहीं है बिहार का राजनैतिक भविष्य आंकने का। इस पर एक-एक सीट का गणित कहीं अधिक भारी पड़ने वाला है।

सीट का गणित क्या है? बिहार में सबसे मज़बूत गणित वही जाति है जो कभी चुनावों को छोड़कर नहीं जाती। हालांकि लोग सीधे-सीधे इसका जिक्र नहीं करते, कान घुमाकर पकड़ते हैं। वे चर्चा करते हैं मुद्दों पर, कहते हैं कि वोट मुद्दों पर ही पड़ना चाहिए और उसे ही वोट देंगे जो मुद्दों को सुलझाए, समस्या का समाधान करे. लेकिन जब पूछो कि समाधान कौन करेगा? तब सब अपनी-अपनी जाति वाले का नाम आगे ठेल देते हैं।

इसी ठेलम-ठेल में बिहार चुनाव फ़ंसा है. एक-एक सीट का अपना विरला समीकरण है और इस समीकरण को प्रभावित करने वाली सारी लहरें ध्वस्त हो चुकी हैं। न तो मोदी/नीतीश की वो लहर अब बची है कि उनके गधे भी जीत जाएं और न लालू/तेजस्वी अब वैसे अछूत रह गए हैं कि उनके घोड़े भी हार जाएं।

भीड़ तो बस घास है जिसे गधे और घोड़े, दोनों ही चबा रहे हैं, चबाते रहेंगे, पर इस बार का चुनाव और उसका अनुमान लगाना अभी तो बहुत मुश्किल है और इस बार बिहार का निर्णय कुछ अलग होगा और इस पर कोरोना की परेशानियों, देश भर के बंद कारोबार का बिहारियों पर पड़ा असर और उन बिहारियों की सोच का भी ठप्पा लगेगा को हर चुनाव में बिहार के बाहर ही रहते थे। इस बार वे चुनाव को बहुत करीब से समझ रहे है और मतदान में उतने ही करीब से इन पार्टी के नेताओं को समझा भी देगे जो अब तक किसी को भी समझ में नहीं आ रहा है।

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