
डिंडोरी में मरीजों की परेशानी बढ़ी, दवा के नाम पर संचालकों की मनमानी कब रुकेगी?
✍️ मोहम्मद साहिबेआलम, उपसंपादक
जनपथ टुडे डिंडोरी, 14 अक्टूबर। आदिवासी बहुल डिंडोरी जिले में गरीब मरीजों को दवाइयों के लिए परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। कहीं डॉक्टर के पर्चे पर लिखी दवा की पूरी स्ट्रिप खरीदने की मजबूरी है, तो कहीं रात के समय दवा देने में आनाकानी, मेडिकल स्टोर जल्दी बंद कर देना और निर्धारित दवा के बजाय दूसरी (सब्स्टीट्यूट) दवा लेने का दबाव बनाने जैसी शिकायतें सामने आ रही हैं।
इसका सबसे ज्यादा असर दूरदराज से आने वाले गांवों में रहने वाले बैगा और अन्य गरीब आदिवासी परिवारों पर पड़ रहा है। सीमित आमदनी के कारण कई मरीज पूरी स्ट्रिप खरीदने में असमर्थ हैं। ऐसे में जरूरी दवा नहीं मिलना उनके इलाज में गंभीर बाधा बन सकता है। सवाल यह है कि जब मरीज डॉक्टर के पर्चे के साथ मेडिकल स्टोर पहुंचता है, तो उसे अपनी जरूरत की दवा के लिए भटकना क्यों पड़ता है?
नियमों की अनदेखी पर संचालकों के खिलाफ औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 और औषधि नियमावली, 1945 के तहत दवाओं की बिक्री निर्धारित नियमों के अनुसार होनी चाहिए। डॉक्टर द्वारा लिखी गई दवा उपलब्ध न होने पर मरीज को बिना उचित जानकारी के दूसरी दवा लेने के लिए बाध्य करना उचित नहीं है। किसी विकल्प के रूप में दूसरी दवा देने से पहले उसकी उपयुक्तता सुनिश्चित करना और जरूरत पड़ने पर चिकित्सक या फार्मासिस्ट की सलाह लेना जरूरी है। हालांकि, हर दवा की स्ट्रिप काटकर देना अनिवार्य है या नहीं, यह दवा की पैकेजिंग और लागू नियमों पर निर्भर करता है लेकिन मरीज़ का स्वास्थ्य सबसे ऊपर होना चाहिए। इस
मामले में जब ड्रग इंस्पेक्टर से पूछा गया तो उन्होंने कहा है कि अभी शिकायत उनके संज्ञान में आई है और जल्द कार्रवाई की जाएगी। अब स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन को मेडिकल स्टोरों की जांच कर शिकायतों की वास्तविकता सामने लानी चाहिए। आदिवासी अंचल के गरीब मरीजों को दवा के लिए परेशान छोड़ देना आखिर कब तक चलेगा? प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि आर्थिक मजबूरी और दवा की अनुपलब्धता किसी मरीज के इलाज में बाधा न बने।

