
मिनरल वाटर से इलाज मामले में जिला अस्पताल पर गिरी गाज: 1 निलंबित, CMHO समेत 3 अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस
मिनरल वाटर से इलाज मामले में जिला अस्पताल पर गिरी गाज: 1 निलंबित, CMHO समेत 3 अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस
संपादक- प्रकाश मिश्रा
जनपथ टुडे डिंडोरी 24 जुलाई 2026- जिला अस्पताल डिंडौरी में पॉइजनिंग के एक मरीज के उपचार के दौरान सामान्य सलाइन की जगह पैक्ड मिनरल वाटर की बोतल के उपयोग का मामला सामने आने के बाद जिला प्रशासन ने बड़ी कार्रवाई की है। मीडिया में मामला उजागर होने के बाद कलेक्टर अंजू पवन भदौरिया ने प्रारंभिक जांच के आधार पर सख्त रुख अपनाते हुए एक नर्सिंग ऑफिसर को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है, जबकि मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO), सिविल सर्जन-सह-अस्पताल अधीक्षक और संबंधित मेडिकल ऑफिसर को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है।
कलेक्टर कार्यालय से जारी आदेश के अनुसार, 22 जुलाई 2026 को चूहे मार दवा खाने के बाद जिला अस्पताल में भर्ती किए गए 18 वर्षीय मरीज सत्यम यादव के उपचार के दौरान अस्पताल में सामान्य सलाइन की जगह पैक्ड मिनरल वाटर की बोतल का उपयोग किया गया। प्रारंभिक जांच में इसे स्थापित चिकित्सकीय मानकों और उपचार प्रोटोकॉल के विपरीत माना गया है।
जांच में यह भी उल्लेख किया गया है कि बिना किसी वरिष्ठ चिकित्सक की सलाह के पैक्ड मिनरल वाटर का उपयोग किया गया, जिससे मरीज के जीवन को खतरा उत्पन्न हो सकता था। आदेश में इसे कर्तव्य निर्वहन में गंभीर लापरवाही तथा मध्यप्रदेश सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1965 के उल्लंघन की श्रेणी में माना गया है।
इन अधिकारियों पर हुई कार्रवाई-
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) डॉ. मनोज कुमार पाण्डेय को कारण बताओ नोटिस।
सिविल सर्जन एवं अस्पताल अधीक्षक डॉ. रमेश मरावी को कारण बताओ नोटिस।
मेडिकल ऑफिसर डॉ. भरत कुमार संत को कारण बताओ नोटिस।
नर्सिंग ऑफिसर भावना चौहान को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया गया।
नोटिस में संबंधित अधिकारियों से 3 अगस्त 2026 तक अपना स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं। संतोषजनक जवाब नहीं मिलने की स्थिति में उनके विरुद्ध विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। वहीं निलंबित नर्सिंग ऑफिसर का मुख्यालय मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी कार्यालय, डिंडौरी निर्धारित किया गया है।
यह कार्रवाई जिला अस्पताल में उपचार व्यवस्था, चिकित्सकीय प्रोटोकॉल के पालन और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
मामले ने सरकारी अस्पतालों में उपचार की गुणवत्ता और मरीजों की सुरक्षा को लेकर भी कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

