रैलियों में स्कूली बच्चे ही क्यों? शिक्षा से बड़ा सरकारी प्रचार नहीं

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संपादक प्रकाश मिश्रा

जनपथ टुडे डिंडोरी 25 जुलाई:- जिले में चल रही नशे से दूरी 2.0 के अंतर्गत नागरिकों को जागरूक करना अच्छी बात है, पर सरकारी योजनाओं का प्रचार हो, नशा मुक्ति अभियान हो, पर्यावरण संरक्षण का संदेश देना हो या फिर किसी विशेष दिवस का आयोजन—अक्सर इन सभी कार्यक्रमों की शुरुआत स्कूली बच्चों की रैलियों से होती है। सवाल यह है कि आखिर हर बार रैलियों का बोझ केवल विद्यार्थियों के कंधों पर ही क्यों डाला जाता है? क्या समाज में जागरूकता फैलाने की जिम्मेदारी सिर्फ बच्चों की है?

डिंडोरी सहित प्रदेश के कई जिलों में यह एक सामान्य दृश्य बन चुका है कि स्कूल खुलते ही बच्चों को कक्षाओं से बाहर निकालकर हाथों में बैनर और तख्तियां थमा दी जाती हैं। कई किलोमीटर पैदल मार्च कराया जाता है, नारे लगवाए जाते हैं और कार्यक्रम समाप्त होने तक उनका पूरा शैक्षणिक समय प्रभावित होता है। इस दौरान नियमित पढ़ाई बाधित होती है, जबकि जिन उद्देश्यों से बच्चों को विद्यालय भेजा जाता है, वे पीछे छूट जाते हैं।

विशेष चिंता की बात यह है कि ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों के विद्यार्थी पहले ही शिक्षा संबंधी अनेक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। ऐसे में यदि पढ़ाई का समय भी रैलियों और आयोजनों में खर्च होने लगे तो इसका सीधा असर उनकी सीखने की क्षमता और परीक्षा परिणामों पर पड़ता है। शिक्षा के क्षेत्र में सुधार की बातें करने वाला तंत्र यदि स्वयं बच्चों की पढ़ाई का समय कम करे, तो यह विरोधाभास स्वाभाविक रूप से सवाल खड़े करता है।

यह भी विचारणीय है कि प्रशासन के पास जनजागरूकता के लिए अनेक विकल्प उपलब्ध हैं। पंचायतें, स्वयंसेवी संस्थाएं, जनप्रतिनिधि, सरकारी कर्मचारी, युवा संगठन, सोशल मीडिया और जनसंचार के अन्य माध्यम कहीं अधिक प्रभावी साबित हो सकते हैं। फिर भी सबसे आसान विकल्प स्कूलों और विद्यार्थियों को ही क्यों माना जाता है?

बच्चों में सामाजिक जिम्मेदारी की भावना विकसित करना आवश्यक है, लेकिन इसके लिए उनकी पढ़ाई प्रभावित करना उचित नहीं कहा जा सकता। यदि किसी अभियान में विद्यार्थियों की सहभागिता आवश्यक भी हो, तो वह सीमित, स्वैच्छिक और विद्यालय की शैक्षणिक गतिविधियों को प्रभावित किए बिना होनी चाहिए।

अब समय आ गया है कि राज्य शासन, शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन इस व्यवस्था की गंभीर समीक्षा करें। विद्यालयों का मूल उद्देश्य गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना है, न कि उन्हें सरकारी प्रचार-प्रसार का स्थायी मंच बना देना। यदि बच्चों का बचपन और उनका शैक्षणिक समय सुरक्षित नहीं रखा गया, तो जागरूकता अभियानों की सफलता का दावा भी अधूरा ही माना जाएगा।

सबसे बड़ा प्रश्न आज भी वही है—रैलियों में स्कूली बच्चे ही क्यों? क्या समाज के बाकी जिम्मेदार वर्गों की कोई भूमिका नहीं है?

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