
पाटनगढ़ की गोंड कला को मिले वैश्विक पहचान, विरासत बचाने की जिम्मेदारी सबकी
✍️ मोहम्मद साहिबेआलम, उपसंपादक
जनपथ टुडे डिंडोरी 29 अक्टूबर:- भारत की सांस्कृतिक विरासत केवल ऐतिहासिक स्मारकों तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के जनजातीय अंचलों में भी ऐसी अनमोल कलाएं जीवित हैं, जो पीढ़ियों से हमारी संस्कृति और परंपराओं को सहेज रही हैं। मध्यप्रदेश के डिंडौरी जिले का पाटनगढ़ गोंड चित्रकला के लिए देश-दुनिया में अपनी विशिष्ट पहचान रखता है।
इसी गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाते हुए गोंड कलाकार दीप श्याम की पहली एकल प्रदर्शनी ‘सर्कुलर स्कैटर – गर्रा’ 29 अक्टूबर से 3 नवंबर 2026 तक नई दिल्ली के बीकानेर हाउस स्थित कलामकार गैलरी में आयोजित की जा रही है। यह प्रदर्शनी न केवल उनकी कलात्मक प्रतिभा को सामने लाती है, बल्कि गोंड कला की व्यापक संभावनाओं को भी रेखांकित करती है।
परंपरा के साथ नई पहचान
वर्ष 1989 से गोंड चित्रकला का अभ्यास कर रहीं दीप श्याम अपनी कला में बिंदुओं, वृत्तों, रेखाओं और ज्यामितीय आकृतियों के माध्यम से प्रकृति, जीवन और लोकसंस्कृति को अभिव्यक्त करती हैं। उनकी कला बताती है कि पारंपरिक विरासत अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए भी नए रूप और विचार अपना सकती है।
स्थानीय कलाकारों को मिले प्रोत्साहन
पाटनगढ़ की गोंड कला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहचान मिलना पूरे डिंडौरी जिले के लिए गर्व की बात है। लेकिन सवाल यह है कि क्या स्थानीय कलाकारों को उनकी प्रतिभा के अनुरूप अवसर और सम्मान मिल रहा है?

कला के संरक्षण के लिए केवल प्रदर्शनियां पर्याप्त नहीं हैं। कलाकारों को आर्थिक सहयोग, बाजार, प्रशिक्षण और अपनी कला प्रदर्शित करने के अवसर उपलब्ध कराना भी जरूरी है। शासन और सांस्कृतिक संस्थाओं को चाहिए कि वे गोंड कला को शिक्षा, पर्यटन और रोजगार से जोड़ने के लिए ठोस पहल करें।
विरासत बचाना हम सबकी जिम्मेदारी
दीप श्याम की प्रदर्शनी इस बात का प्रमाण है कि जनजातीय कला में वैश्विक पहचान हासिल करने की क्षमता है। जरूरत है इस विरासत को सहेजने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने की।
पाटनगढ़ की गोंड कला केवल डिंडौरी की पहचान नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश की सांस्कृतिक धरोहर है। इसे सम्मान और संरक्षण देना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है, ताकि यह कला आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा और आजीविका का माध्यम बनी रहे।



